आयुर्वेद विज्ञान – Ayurveda

Ayurvedic Science or Ayurvedic Medicine

आयुर्वेद वह विज्ञान है जो जीवन के लिए हितकारी और अहितकारी, पथ्य और अपथ्य, जीवन जीने की शैली, रोगों से बचाव के तरीके और रोगों के उपचार के उपायों का ज्ञान कराता है।

आयुर्वेद (Ayurveda) शब्द दो शबदो से मिल कर बना हैं “आयुर+वेद” जिसमे अयूर का मतलव हैं जीवन और वेद का मतलव हैं विज्ञान अर्थात आयुर्वेद का अर्थ हैं जीवन का विज्ञान अथवा ज्ञान।

आयुर्वेद दुनिया की सबसे पुरानी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति हैं जिसका जिक्र वेदों में भी किया गया हैं। पुराने ग्रन्थों और पाठो में इसकी उत्पति और प्राचीनता का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार आयुर्वेद ने पौधों और मानव की उत्पति के साथ ही जन्म लिया हैं ।

आयुर्वेद विभिन्न बीमारियों और रोगों की रोकथाम और उनके उपचार के लिए एक प्राकृतिक विज्ञान है, इसके साथ ही ये स्वस्थ्य रहने के कुछ लाभदायक नुस्खे बताता हैं।

जिन प्राचीन किताबो में आयुर्वेद का वर्णन किया गया हैं विद्वानों का कहना हैं की वो 2000 साल से भी पुरानी हैं तो वही कुछ का तो यहां तक कहना हैं की ये पुस्तकें 5000 – 10000 साल से भी पुरानी हैं।

जहाँ एलोपैथिक दवाईयां या पद्धति अपना ध्यान सिर्फ बीमारी को कम करने पर केंद्रित करती हैं, वही आयुर्वेद रोग का असली कारण और उसे कैसे ठीक किया जा सकता हैं के बारे में ज्ञान देता हैं और यही मुख्य कारण हैं की आयुर्वेद को हर तरह के रोगों को ठीक करने के लिए सबसे कारगर माना जाता हैं।

आयुर्देव सबसे पुराने पारंपरिक चिकित्सा पद्तियो में से एक हैं और पुराने समय से भारत के महाद्वीपो में आवश्यक चिकित्सा के रूप में प्रयोग किया जाता रहा हैं। आयुर्वेद के उस्ताद जिनका नाम शुस्रात हैं, को शल्य चिकित्सा के जनक के रूप में जाना जाता हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में भी मान्यता प्राप्त हैं । अपने रोगों के इलाज़ के लिए 90% भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा का प्रयोग अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक बार ज़रूर इस्तेमाल करते हैं। दुनिया भर के लगभग 10 अरब लोगो ने आयुर्वेदिक दवा को घरेलु उपाय के रूप में विभिन्न रोगों जैसे सर्दी, खांसी, पेट दर्द, कब्ज, तनाव, स्मृति हानि, सामान्य कमजोरी आदि के लिए उपयोग किया है।

आयुर्वेद स्वास्थ्य विज्ञान और चिकित्सा के लिए एक समग्र प्रणाली है

आयुर्वेद एकलौता प्राचीन विज्ञान हैं जिसने पूरी तरह से व्यवस्थित और जैविक शिष्टाचार में स्वास्थ्य के बारे में बताया था। कुछ ऐसे ही पॉइंट्स हैं जो बताते हैं की किस तरह आयुर्वेद ने स्वास्थ्य विज्ञान में अपना योगदान दिया है।

  1. आयुर्वेद ने स्वास्थ्य, रोग, बिमारियों के कारण और कारको के सुनियोजित विवरण को उपलब्ध कराया गया है।
  2. आयुर्वेद सिर्फ एक ऐसा पहला विज्ञान है जिसमे भविष्यसूचक, बीमारियों के नैदानिक ​​लक्षण और रोग उपचार और रोकथाम की तकनीको को विस्तार से बताया गया है।
  3. आयुर्वेद की एक और शाखा हैं जिसे “रसायन (rejuvenation science)” के रूप में जाना जाता हैं। यह सिर्फ एक ऐसा विज्ञान हैं जो ये मानता हैं की किसी भी बीमारी को उसे होने से पहले ही ठीक किया जा सकता हैं। आजकल विभिन्न बीमारियों को दूर करने के लिए टीकाकरण की नयी तकनीको को विकसित किया गया हैं। आयुर्वेद ने कुछ प्राकृतिक दवाईयो को बनाया हैं, जो न सिर्फ बीमारियों की रोकथाम करती हैं, बल्कि शरीर का कायाकल्प भी करती हैं।
  4. आयुर्वेद कुछ ऐसे रोगों का इलाज़ करने में सफल रहा हैं जिन्हें पश्चिमी दवाओं समेत बाकी कई  स्वास्थ्य विज्ञानो के तौर तरीकों में लाइलाज घोषित कर दिया गया था। कई आधुनिक विशेषज्ञओ ने ये तक कहा हैं की आयुर्वेद एक उगते हुए सूरज की तरह हैं, जबकि बाकी तरीके अस्त सूरज के समान हैं।
  5. पूरी दुनिया से बहुत से लोग भारत में आयुर्वेदिक इलाज़ के लिए आ रहे हैं और अपनी बीमारियों के लिए इलाज़ तलाश रहे हैं।

आयुर्वेद एक पूरा विज्ञान है

आयुर्वेद एक हिंदी परंपरागत प्राकृतिक और पवित्र दवा पद्ति हैं और एक तरह से आयुर्वेद विज्ञान (Ayurvedic Science) और जीवन की अंतरात्मा की आवाज है।

आयुर्वेद प्रकृति के निहित सिद्धांतों का उपयोग करता हैं और ये उचित स्वास्थ्य को बनाए रखता है। आयुर्वेद सब की जीवन शैली में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह हमें बताता हैं की मौसम के बदलने पर अपनी जीवनशैली को कैसे समायोजित करें, इसके अलावा आयुर्वेद शांत रहने, सही निर्णय लेने और जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार लाने में भी मदद करता है। सभी विज्ञानों के अपने सिद्धान्त और तकनीके या सूत्र हैं, आयुर्वेद विज्ञान के साथ भी ऐसा ही हैं। आयुर्वेद विज्ञान पांच तत्व के सिद्धांत, तीन दोष सिद्धांत और सात शरीर निर्माण तत्वों के सिद्धांत पर खड़ा हैं। यह तीन सिद्धान्त गणित की तरह ही हैं और इसकी बिलकुल सटीक गणना हैं, हालांकि, उनका गणित और गिनती तीन शरीर दोष और दूसरे अन्य सिद्धांतों से संबंधी संकेतो और लक्षणों पर आधारित हैं।

आयुर्वेद विज्ञान के पास एक द्वितीय सिद्धांत यह हैं की अब इसकी तुलना आधुनिक विज्ञान के आनुवंशिक सिद्धांत की जा सकती हैं। इस सिद्धान्त में, आयुर्वेद का मानना हैं की सब लोग अलग हैं और सामान दवाई एक ही बीमारी के लिए हरेक व्यक्ति पर असर नही कर सकती। हमें शरीर के संविधान (प्रकृति) को समझना होगा उसके बाद ही हम उपचार के तरीको और दवाई के बारे में फैसला कर सकते हैं उसके बाद ही उस बीमारी का उचित और सही तरीके से इलाज़ किया जा सकता हैं।

आयुर्वेद का इतिहास

ऐसा माना जाता हैं की ऋग्वेद दुनिया की सबसे पुरानी पुस्तक हैं और विद्धानों का मानना हैं की निर्माण काल ईसा के 3 हजार से 50 हजार वर्ष पूर्व तक का माना गया है, इसमें भी आयुर्वेद का जिक्र किया गया हैं, जिससे पता चलता हैं की आयुर्वेद उससे भी पुराना हैं। इसमें मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ अग्निवेश के नाम का भी उल्लेख किया गया है और इसके अनुसार ब्रह्मा से प्रजापति ने, प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने, उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया।

इसके बाद भरद्वाज ने आयुर्वेद से होने वाले फायदों जैसे लंबी, सुखी और आरोग्य ज़िन्दगी के बारे में बाकी ऋषियों में प्रचार किया उसके बाद पुनर्वसु आत्रेय ने अपने छे शिष्यो जिनका नाम अग्निवेश, भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि था को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। इन छे शिष्यो में अग्निवेश सबसे बुद्धिमान थे उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने के बाद पहली संहिता का निर्माण किया। इसके बाद इसका एक और संस्कार बनाया चरक ने, इसी कारण उसका नाम चरक संहिता जिसे आयुर्वेद का आधार माना जाता हैं।

ऋग्वेद में आयुर्वेद के ऐसे ऐसे चमत्कारों का वर्णन किया गया हैं, जिसको हमारे आजकल के विद्वान तक समझ नही पाए हैं, इससे अनुमान लगाया जा सकता हैं उन समय में आयुर्वेद की स्तिथि कितनी उन्नत थी। ऋग्वेद में अश्विनी कुमार के चिकित्सा चमत्कारों का विस्तार से वर्णन किया गया हैं। अश्वनी कुमार को औषधियों का बहुत अच्छा ज्ञान था उन्होंने दधीचि से मधुविद्या और प्रग्वयविद्या की शिक्षा प्राप्त की थी। इसके अलावा इन्द्र के चिकित्सा चमत्कार के किस्से भी ऋग्वेद में दिए गए हैं। यथा-अपाला के चमड़ी के रोग और उनके पिता के रोग को ठीक करना, अंधपरावृज आँखों की रौशनी बापिस आना और पंगु श्रोणि के रोगों को ठीक करना इसी तरह के कुछ उदहारण हैं जिनका वर्णन इसमें किया गया हैं। इस सबसे आयुर्वेद के प्राचीन और अद्भुत विज्ञान के बारे में साफ़ तोर पर पता चलता हैं। आयुर्वेद की उत्पति में हालाँकि कोई उचित वृत्तचित्र संदर्भ उपलब्ध नही हैं पर ऐसा माना जा सकता हैं की इसकी उत्पति ऋग्वेद के आसपास की या उससे भी पुरानी हैं।

आयुर्वेद के इतिहास को तीन भागो में बांटा गया हैं

  1. संहिता काल: चरक संहिता के द्वारा आयुर्वेद के क्षेत्र में अद्भुत सफलता पायी गयी और संहिताकाल 5वीं शती ई.पू. से 6वीं शती तक माना जाता हैं।
  2. व्याख्याकाल: इस काल आचार्य डल्हड़सुश्रुत संहिता में पायी गयी उपलब्धियों को खोजो को महत्वपूर्ण माना जाता हैं और इसका समय हैं 7वीं शती से लेकर 15वीं शती तक।
  3. विवृतिकाल: इस काल का समय 14वीं शती से लेकर आधुनिक काल तक माना गया हैं।  इस काल में कुछ गर्न्थो में लिखा गया जैसे  माधवनिदान, ज्वरदर्पण। इस काम में आयुर्वेद का भरपूर उपयोग हो रहा हैं।

आयुर्वेद – सभी चिकित्सा प्रणालियों की जनक हैं

आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा की मुख्य धारा है जिसका सम्बन्ध स्वस्थ जीवन शैली के साथ हैं इसे सभी चिकित्सा पद्तियो की जनक के रूप में जाना जाता हैं और ऐसा भी माना गया हैं की इसकी उत्पति मनुष्य की उपत्ति के साथ हो गयी थी। इसको कुदरती चीज़ों के द्वारा विभिन्न रोगों का इलाज, अनुसंधान और शोध के लिए मनुष्य का इतिहास से प्राप्त अनुभव के माध्यम से विकसित किया गया है। पुराने ज़माने में जड़ी बूटियों और प्राकृतिक प्रदार्थो का प्रयोग रोग के इलाज़ खासतौर पर यांत्रिक चोट के कारण उत्पन्न घावों का इलाज़ किया जाता था। बाकि रोग दुर्लभ थे और महामारी आम थी जिसमे कई लोग मर रहे थे और इसका कोई इलाज़ नही मिल पा रहा था, उस समय के बुद्धिमान लोग हमेशा इससे छुटकारा पाने और लोगो को इससे बचाने के बारे में सोचते रहते थे। प्राचीन काल में मनुष्य खाने के लिए इधर उधर भटकते थे और प्रकृति के पास रहते थे। ऐसे में उन्हें कई लाभकारी जड़ी-बूटियां, पौधे यहाँ तक की पशु उत्पाद मिले जिन्हें वो चिकित्सा में प्रयोग करने लगे और उससे अपने रोगों को निजात पाने में ये सब सहायक होने लगे। समय के साथ साथ मनुष्य ने इलाज़ और तरह तरह के रोगों को ठीक करने के लिए कई प्राकृतिक उपायों की खोज कर ली। उन्होंने कोशिश और कई प्रकर्तिक चीज़ों के साथ प्रयोग किया, जानवरो को बारीकी से देखा की वो अपनी विमारियो का इलाज़ किस तरह से करते हैं और एक इलाज़ करने के प्राकृतिक विज्ञान को खोज, जिसे बाद में भारतीय महाद्वीपो में आयुर्वेद का नाम दिया गया।

आयुर्वेद की शाखाएं

आयुर्वेद की आठ शाखाएं हैं और आयुर्वेदिक शब्दावली में यही आठ महत्वपूर्ण शाखाये को अष्टांग आयुर्वेद के रूप में जाना जाता हैं। उनका विवरण इस प्रकार हैं।

1. कायचिकित्सा

कायचिकित्सा आयुर्वेद में साधारण दवाईयों या ऐसा कहे की आंतरिक दवाईयो दर्शाता है यानि की ये वो चिकित्सा हैं जो शरीर के रोगग्रस्त होने पर की जाती है। आयुर्वेद चिकित्सा की यह मुख्य शाखा हैं। संस्कृत में काया का मतलव हैं शरीर या शरीर में उपापचय (Metabolism) और चिकित्सा का मतलव हैं रोगनिदान या उपचार। यह आयुर्वेद के मुख्य अध्ययन का विषय हैं। इसमें रोग-निदान तकनीक और जैविक सफाई, पंचकर्म, जड़ी-बूटियां और आयुर्वेदिक दवाईयां शामिल हैं इसी लिए ये एक तरह से सम्पूर्ण स्वास्थ्य विज्ञान हैं।

2. बालचिकित्सा

बालचिकित्सा या कौमारभृत्य बच्चो के स्वास्थ्य, रोगों और प्रसूति शास्त्र बीमारियों से सम्बंधित हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसे दो भागो में बांटा जा सकता हैं – एक हैं बालचिकित्सा और दूसरा हैं प्रसूति शास्त्र।

पुराने समय में आयुर्वेद ने आधुनिक विज्ञान की इन दोनों शाखायों को एक ही शास्र में रखा गया था, उस समय आयुर्वेद में वालचिकित्सा का सिर्फ एक ही भाग होता था क्योंकि दोनों भाग बच्चो से ही जुड़े हुए थे।

आयुर्वेद के अनुसार, कुमार का मतलव हैं 0 – 16 साल तक के बच्चे और भृत्य स्वच्छता और  देखभाल की और संकेत करता हैं। कौमारभृत्य एक ऐसा विज्ञान हैं जो गर्भ में बच्चे से लेकर 16  साल तक के विकसित बच्चे के रोगों के लिए निवारक और उपचारात्मक उपाय प्रदान करता है। आयुर्वेद के विद्वानों का ये मानना हैं इस समय अंतराल में की गयी देखभाल बच्चो की पूरी उम्र काम आती हैं मतलव अगर बच्चो का इस उम्र में अच्छे से उपचार या ख्याल रखा जाये तो आगे की उम्र में उन्हें कोई परेशानी नही होती।

3. भूतविद्या

भूतविद्या को ग्रह चिकित्सा भी कहा जाता हैं जो मनोरोग चिकित्सा से सम्बंधित हैं। भूतविद्या मानसिक जीवन, दिमाग और इसकी विशेषतायो का विज्ञान हैं। यह आयुर्वेद विज्ञान की वो शाखा हैं जो दिमागी विकारो की रोकथाम, निदान और उनके उपचार से सम्बंधित हैं। भूत विद्या में जिन तरीको का उपयोग होता हैं वो जड़ी-बूटियों से भावनाओं को सही करने, मानसिक आस्था, दिमागी भ्रम को समाप्त करने और मन को शांति प्रदान करने से संबंधित हैं। आधुनिक समाज में इसे यानि भूतविद्या को मनोरोग, मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा से जोड़ कर देखा जा सकता हैं।

4. शालाक्यतंत्र

शालाक्य तंत्र का दूसरा नाम हैं ऊर्ध्वांग चिकित्सा जिसमे गले यानि कंठ के ऊपरी भाग के अवयवों की चिकित्सा की जाती हैं। गले से ऊपर के अवयवों से मतलव हैं कान, नाक, गला और आँखे और शालाक्य तंत्र इन्ही के अंतर्गत आता हैं। इसीलिए आधिनिक चिकित्सा के अनुसार ये ऑटोरहीनओलरींगोलॉय (otorhinolaryngology) और नेत्र विज्ञान (ophthalmology) में आता हैं। शालाक्य तंत्र में शालाक्य का मतलव होता हैं – जाँच – पड़ताल करना। शालाक्य तंत्र को आगे नेत्रचिकित्सा (नेत्र विज्ञान), करणचिकित्सा (कर्णविज्ञान), नसचिकित्सा  (रहिनोलोग्य), मुखरोगचिकित (मौखिक स्वच्छता, दंत चिकित्सा और स्वरयंत्र), और शिरोरोगचिकित्सा (कपाल के रोगों) में वर्गीकृत किया जाता है। आचार्य निमि को शालाक्य तंत्र के पिता के रूप में माना जाता है।

5. शल्यतंत्र

शल्यतंत्र आयुर्वेदिक विज्ञान की वो शाखा हैं जो आपरेशन तकनीक के जरिये चोट या घाव की देखभाल करता हैं और उसका उपचार करता हैं। इसके आधुनिक शल्य चिकित्सा के साथ जोड़ा जा सकता है। शल्यतंत्र का मतलव हैं ऑपरेशन और शल्यतंत्र आयुर्वेदिक चिकित्सा की वो पद्दति हैं जिसमे सिर्फ दवाईयो से ही नहीं रोगों को ठीक किया जाता बल्कि इसमें आपरेशन की ज़रूरत पड़ती हैं ताकि जख्म या रोग जल्दी ठीक हो सके। सुश्रुत को आधुनिक सर्जरी का जनक माना जाता हैं और आधुनिक चिकित्सा के तरीके पुराने तरीको का ही आधुनिक रूपान्तर हैं।

6. अगदतंत्र

अगदतंत्र आयुर्वेदिक औषध विज्ञान की ऐसी शाखा है जो विष के स्वभाव, प्रभाव और उपचार के साथ सम्बंधित हैं। इस विज्ञान को विषचिकित्सा भी कहा जाता हैं और यह वो चिकित्सा हैं जो विष ग्रस्त होने पर की जाती हैं। किसी भी कीड़े, जानवर या किसी अन्य प्राणी के काटने से खतरनाक स्तिथि पैदा हो सकती हैं और तो मृत्यु तक का खतरा रहता है। इन विषक्त प्रदार्थो के खिलाफ की गयी चिकित्सा को अगदतंत्र कहा जाता हैं।  डाउनशत्र में डाउनश का मतलव हैं काटना।आधुनिक दिनों में व्यवहारायुर्वेद (ज्यूरिस्प्रूडेंस) अगद तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

7. रसायन चिकित्सा

रसायन चिकित्सा आयुर्वेद विज्ञान की वो शाखा हैं जो शरीर की कायाकल्प, बीमारियों से बचाने और आयु लंबी करने और स्वस्थ्य ज़िन्दगी जीने का तरीका हैं। इसमें आयुर्वेदिक पोषण, आयुर्वेदिक खुराक, आयुर्वेदिक रोगों, डिटॉक्सिफिकैशन (detoxification) और इम्यूनोलॉज (Immunology) शामिल हैं जो बुढ़ापे में रोगों से बचने, बुढ़ापे में स्वस्थ रखने, विषहरण (detoxification), और प्रतिरक्षा विज्ञान के उपयोगी अंग हैं।

एक तरह से यौवन को बनाए रखते हुए बुढ़ापा दूर रखने की चिकित्सा को रसायन चिकित्सा कहा जाता हैं। रसायन चिकित्सा को जार चिकित्सा भी कहा जाता हैं जिसमे जरा का अर्थ है बुढ़ापा

आमतौर पर रसायन  रस और ऊतकों (आयुर्वेद के सप्तधातु) को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल करने वाले पदार्थ है और रसायन अष्टांग आयुर्वेद का अभिन्न हिस्सा है। आजकल आधुनिक विज्ञान में  डायटेटिक्स (Dietetics), इम्यूनोलॉजी (immunology), जराचिकित्सा (geriatrics) और निवारक और सामाजिक दवाओं (social and preventive medicine) के साथ जोड़ा जा सकता हैं।

8. वृष्या चिकित्सा या वाजीकरण

वृष्या चिकित्सा कामोत्तेजक का विज्ञान है। इसमें शारीरिक शक्ति में सुधार के लिए आयुर्वेदिक दवाएं भी शामिल है। इस चिकित्सा को वाजीकरण भी कहा जाता हैं और इस चिकित्सा के माध्यम से ‘प्रजनन’ से सम्बंधित तथ्यों को समझाया जाता है। यह ‘सुप्रजनन’ से सम्बंधित हैं और बांझपन आदि से संबंधित समस्याओं को दूर करने में सहायक हैं।

आयुर्वैदिक चिकित्सा के लाभ

  • आयुर्वेद चिकित्सा की विधियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं और इस चिकित्सा के बाद मनुष्य का मानसिक के साथ साथ शारीरिक स्वास्थ्य सुधार भी होता हैं।
  • आयुर्वेद में ज्यादातर जड़ी-बूटियों, पौधों या फूलो और फलो से उपचार किया जाता हैं इसके लिए किसी भी ऐसी चीज़ का प्रयोग नही किया जाता जो प्रकति के करीब न हो या प्रकृति से ही न हो इसका मतलव हैं कि यह चिकित्सा पद्ति प्रकृति के नजदीक हैं।
  • अन्य चिकित्सा की विधियों में कोई न कोई साइड इफ़ेक्ट होता हैं पर आयुर्वेद एक ऐसी चिकित्सा हैं जिसमे कोई साइड -इफ़ेक्ट नही हैं क्योंकि ये पूरी तरह से प्राकृतिक चिकित्सा हैं जिससे शरीर को कोई नुकसान नही पहुँच सकता।
  • आयुर्वेद सिर्फ बीमारियों का इलाज़ ही नही करता बल्कि उनकी रोकथाम भी करता हैं जबकि बाकी पद्तियों में बीमारी से एकदम से रहत तो मिलती हैं पर बीमारी ख़त्म नही होती पर आयुर्वेद में बीमारी जड़ से ख़त्म हो जाती हैं।
  • आयुर्वेद मनुष्य की पुरानी से पुरानी बीमारी को भी ठीक करने के लिए असरदार हैं। ऐसी कई केस आयुर्वेद में देखने के लिए मिले हैं जिसमे जीर्ण ठीक हुए हैं या उनमे विशेष रूप से प्रभाव हुआ है।
  • न सिर्फ आयुर्वेद इलाज़ के द्वारा रोगों को दूर करता हैं बल्कि आजकल के तनाव भरे और भागदौड़ वाले जीवन में स्वाथ्य खाने और जीवनशैली में कुछ आसान से परिवर्तन करने से बीमारियों को दूर रखने के उपाय भी बताता हैं ताकि आप एक स्वस्थ्य जीवन का निर्वाह कर सके।
  • आयुर्वेदिक औषधियाँ बीमार लोगो के साथ साथ स्वास्थ्य लोगो के लिए भी लाभदायक हैं जिनके सेवन मनुष्य अपनी ज़िन्दगी को खुशहाल बना सकते हैं और इम्युनिटी (immunity) भी बढ़ा सकते है, जिससे रोग पास नही फटकते।
  • इलाज़ की दूसरी विधिया और तरीके महंगे होते हैं पर आयुर्वेद में सिर्फ जड़ी-बूटियों का प्रयोग होता हैं जिससे खर्च कम आता हैं इसका मतलव यह हैं की आयुर्वेदिक चिकित्सा सस्ती होती हैं और हर कोई व्यक्ति चाहे गरीब हो या अमीर इस चिकित्सा का खर्च उठा सकता हैं।

आयुर्वेदिक औषधियाँ

जिन साधनो से बिमारियों या रोगों का इलाज़ किया जाता हैं और उनकी रोकथाम की जाती हैं उन्हें औषधियाँ कहा जाता हैं। औषधियां दो तरह की होती हैं – अपद्रव्यभूत और द्रव्यभूत।

अपद्रव्यभूत औषधियाँ

अपद्रव्यभूत औषधियाँ ऐसी औषधियाँ हैं जिनमे द्रव्य का प्रयोग नही होता मतलव किसी भी दवाई का प्रयोग नही होता हैं। इसके उदहारण हैं जागना, सैर करना, व्यायाम, उपवास, आराम, सोना आदि।

द्रव्यभूत औषधियाँ

इस तरह में द्रव्यों का प्रयोग होता है। इस द्रव्य भी तीन तरह के होते हैं।

  • जांगम (Animal Drugs): ऐसी औषधियाँ जो विभिन्न प्राणियों से प्राप्त होती हैं जैसे शहद दूध, दही, घी, मांस, मूत्र, पित्त, वसा आदि।
  • औद्भिद (Herbal Drugs): इनमे पोधो और फलों का प्रयोग होता हैं जैसे जड़ें या फूल आदि
  • पार्थिव Mineral Drugs): इन औषधियां सोना, चांदी, सीसा, रांगा, तांबा, लोहा, चूना, अभ्रक, संखिया आदि का प्रयोग किया जा सकता हैं।

आयुर्वेदिक दवाओं में आयुर्वेदिक जड़ी बूटी, आयुर्वेदिक हर्बल फार्मूलो, पारंपरिक योगों और दवा निर्माण के तरीके शामिल हैं। आयुर्वेदिक दवाओं को ऐसे वर्गीकृत किया हैं:

  • अरिष्ट: (तरल दवाएं किण्वन की प्रक्रिया के माध्यम से तैयार की जाती हैं)
  • असाव: (तरल दवाएं किण्वन की प्रक्रिया के माध्यम से तैयार की जाती हैं)
  • भस्म: (ऑक्सीकरण और कैल्शिफिकेशन की तकनीक के साथ तैयार की जाती हैं)
  • चूर्ण: (एक या एक से अधिक हर्बल पाउडर या हर्बल फार्मूलों से मिल कर तैयार की जाती हैं )
  • घृत: (औषधीय घी)
  • गुड: (औषधियों जिन में गुड़ का प्रयोग किया जाता है)
  • गुग्गुलु: (इसमें गूगल को एक मुख्य सामग्री के रूप में प्रयोग किया जाता है)
  • गुटिका: (केरल आयुर्वेद में गोलियां)
  • कषायं: (केरल आयुर्वेद में काढ़े के रूप में प्रयोग किया जाता हैं)
  • क्वाथ: (हर्बल काढ़ा)
  • लौह: (लौह भस्म युक्त दवा)
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