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आयुर्वेद

कफ दोष के गुण, कर्म, मुख्य स्थान, प्रकार, असंतुलन, बढ़ने और कम होने के लक्षण

कफ एक ऐसी संरचनात्मक अभिव्यक्ति है जो द्रव्यमान को दर्शाता है यह हमारे शरीर के आकार और रूप के लिए भी ज़िम्मेदार है। जैविक रूप से, यह द्रव और पृथ्वी का संयोजन है। कफ के अणु शरीर के जटिल अणु होते हैं जो कोशिकाओं में उत्तकों, ऊतकों के अंगों और जो पूरे शरीर में अंगों की स्थिरता को बनाये रखते है। जैविक रूप से, सभी कोशिकाएं और उत्तक आदि कफ दोष से बने है,…
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पित्त दोष के गुण, कर्म, मुख्य स्थान, प्रकार, असंतुलन, बढ़ने और कम होने के लक्षण

पित्त शरीर का ऐसा भाव(दोष) है जो शरीर की गर्मी, आग और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। जैविक रूप से, यह ऊर्जा और द्रव का संयोजन है। ऊर्जा सक्रिय सिद्धांत के रूप में कार्य करती है और द्रव एक वाहन की भूमिका निभाती है। पित्त तत्वों के कारण शरीर में सभी चयापचय प्रक्रियाएं होती हैं। पित्त कफ अणुओं (जटिल पदार्थों) को छोटे टुकड़ों में तोड़ता है और फिर ऊर्जा…
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वात दोष के गुण, कर्म, मुख्य स्थान, प्रकार, असंतुलन, बढ़ने और कम होने के लक्षण

"वा गतिगंधनयो" धातु से वात अर्थात वायु शब्द निष्पति होती है।  वात एक अभिव्यक्ति है और मुख्य कार्यकारी शक्ति है जो श्वाश, शारीरिक और मानसिक कर्म, परिवहन, संचलन, चिंतन, चेष्टायुक्त कार्य आदि के लिए जिम्मेदार होती है।
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आम, आम विष, आम के लक्षण और प्रभाव एवं आम की उत्पति कैसे रोकें

आयुर्वेद में आम एक महत्वपूर्ण कारक है। यह पोषण नाली, कोशिका और उत्तकों में कम पाचन अग्नि के कारण शरीर में पैदा होता है। आम शरीर की प्रणालियों को रोक सकता है, जिनसे कई बीमारियां होती । आम को विषाक्त कणों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो शरीर में कमजोर पाचन या चयापचय के कारण होता है।
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ऋतु हरीतकी – सदा स्वस्थ रहने के लिए कैसे करें हरड़ का प्रयोग

स्वास्थ्य लाभ के लिए ऋतु के अनुसार हरीतकी (हरड़) का सेवन उपयुक्त अनुपान के साथ करने की विधि को आयुर्वेद में ऋतु हरीतकी कहा जाता है। आयुर्वेद की मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक प्रकृति के अनुसार और वातावरण में होने वाले बदलाव के अनुसार औषधि और उनके अनुपानों में भी अंतर आता है। औषधि अच्छे गुणों के लिए हमें इन बातों का ध्यान रखना…
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मेध्य रसायन और मेध्य गुण वाले अन्य द्रव्य

मेध्य रसायन (Medhya Rasayana) शब्द संस्कृत के दो शब्दों के मेल से बना है - मेध्य और रसायन। मेध्य का अर्थ है बुद्धि, अनुभूति, बोध या संज्ञान। आयुर्वेद में रसायन वह होता है जो स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और रोगों के होने की संभावना को कम कर देता है।मेध्य रसायन का अर्थ है जो मेधावर्धक, स्मरण शक्ति वर्धक, मस्तिष्क बल्य है और मानसिक रोगों को होने से…
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आयुर्वेद के त्रिसूत्र

हेतुलिँगौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्। त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः।।आयुर्वेद में चिकित्सा के तीन अंग - हेतु, लिंग, और औषध माने जाते है। इन तीनो को त्रिसूत्र कहा जाता है। आयुर्वेद अनुसार चिकित्सक को इन तीनों अंगों का ज्ञान होने चाहिए।व्याख्या: कभी कभी, भारतीय आयुर्वेदिक विद्वान आयुर्वेद को त्रिसूत्र आयुर्वेद भी कहते हैं…
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बी. ए. एम. एस. (बैचलर ऑफ आयुर्वेद मेडिसिन एंड सर्जरी)

आयुर्वेद भारत की एक प्राचीन चिकित्सा पद्धति है जो लगभग 5000 वर्षो से भारत में प्रचलित है। इस चिकित्सा पद्धति का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए भारत में आयुर्वेद में स्नातक (बी. ए. एम. एस.) की उपाधि प्राप्त कारण अनिवार्य है।बी. ए. एम. एस. (B.A.M.S.)  अर्थात बैचलर ऑफ आयुर्वेद मेडिसिन एंड सर्जरी (Bachelor of Ayurvedic Medicine & Surgery)…
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वणर्य द्रव्य या औषधि

आयुर्वेद में त्वचा के वर्ण में सुधार लाने वाली और चमक बढ़ाने वाली औषधि को वणर्य कहा जाता है। यह शरीर के रोगों के कारण विकृत हुए वर्ण को द्वारा प्राकृतिक करने में सहायक होती है। इसका प्रभाव भ्राजक नामक पित्त पर पड़ता है। इसकी वृद्धि अथवा हानि त्वचा के प्राकृतिक वर्ण में परिवर्तन कर देती है जो वणर्य औषधिओं पुनः प्राकृतिक किया जा सकता है।विकृत…
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पंचकषाय कल्पना

आयुर्वेद में पंच कषाय कल्पना का वर्णन मिलता है। औषधि को सेवन योग्य बनाने के तरीके को कषाय कल्पना कहा जाता है। कषाय कल्पना भैषज्य विज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिसा है। चरक संहिता में औषधि बनाने के मुख्य निम्नलिखित पांच तरीकों को पंच कषाय कल्पना का नाम दिया गया है।स्वरस (Juice) कल्क (Paste) क्वाथ (Decoction) हिम (Cold Infusion) फांट…
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