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आयुर्वेदिक दवाइयाँ

शिलाजीत का शोधन कैसे करते है? (How to Purify Shilajit)

आयुर्वेद में शिलाजीत का प्रयोग इस का शोधन करने के बाद ही किया जाता है। है। जो शिलाजीत हिमालय आदि पहाड़ों से प्राप्त होता है वह कई तरह के पत्थर, मिट्टी आदि अशुद्धियों से युक्त होता है। इसलिए इसे मनुष्य के खाने योग्य नहीं माना जाता। इस को खाने योग्य बनाने के लिए आयुर्वेद में शोधन प्रक्रिया का उल्लेख है।  यह शोधन प्रक्रिया इन सब अशुद्धियों को…
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आरग्वधारिष्ट के फायदे, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

आरग्वधारिष्टम प्राकृतिक किण्वन प्रक्रिया के माध्यम से बनाई गयी अरिष्ट श्रेणी (Arishta Category) में वर्गीकृत एक आयुर्वेदिक और हर्बल औषधि है। यह औषधि त्वचा रोग, आंत्र कृमि, श्वित्र (leucoderma) और खाँसी में उपयोगी है। यह व्रण, घाव और फोड़े फुंसियों से आरोग्य प्राप्ति की गति को तेज करती है। यह रक्त का विषहरण करती है और शरीर में आम (विषाक्त पदार्थों…
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अयस्कृति के फायदे, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

अयस्कृति आमतौर पर केरल में मूत्र संबंधी विकार, रक्तस्राव, ल्यूकोडर्मा (leucoderma), त्वचा विकार, भूख की कमी, कृमि संक्रमण, रक्ताल्पता, शीघ्रकोपी आंत्र विकार के लक्षण, कुअवशोषण विकार और मोटापे के उपचार के लिए प्रयोग की जाने वाली एक आयुर्वेदिक औषधि है। अयस्कृति का मुख्य प्रभाव वात दोष और कफ दोष पर पड़ता है। यह वसा दहन को उत्प्रेरित करके शरीर में  वसा…
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अशोकारिष्ट के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

अशोकारिष्ट एक तरल आयुर्वेदिक औषधि है। इसमें लगभग 3 से 9% स्व-जनित मद्य सम्मिलित हो सकता है। यह महिला प्रजनन प्रणाली से संबंधित लगभग सभी प्रकार के रोगों में प्रभावशाली है। महिलायों के गर्भाशय सम्बंधित विकारों में यह एक उत्तम औषधि मानी गयी है। अशोकारिष्ट डिम्बग्रंथि को सुदृढ़ कर मासिक धर्म के समय भारी प्रवाह को सामान्य करने में मदद करता है और दर्द…
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अहिफेनासव के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

अहिफेनासव का उपयोग गंभीर अतिसार (दस्त) के उपचार में किया जाता है। यह हैजा में बार बार आने वाले पतले मल की आवृत्ति को कम करने में मदद करता है। घटक द्रव्य (संरचना) घटक द्रव्य मात्रा संशोधित मद्यसार 400 भाग शुद्ध अहिफेन 16 भाग नागरमोथा 4 भाग इन्द्रयव 4 भाग इलायची 4 भाग
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कासीस गोदन्ती भस्म के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

कासीस गोदन्ती भस्म (Kasis Godanti Bhasma) एक खनिज आधारित आयुर्वेदिक औषधि है जिसका उपयोग मलेरिया, तीव्र ज्वर, जीर्ण ज्वर, प्लीहावर्धन, श्वेत प्रदर और भूख ना लगने पर किया जाता है। कासीस गोदन्ती भस्म का मुख्य रूप से मलेरिया में उपयोग किया जाता है। इसके उपयोग से ज्वर का ताप और जाड़ा लगना कम हो जाता है। यह असामान्य मासिक धर्म और कष्टार्तव में भी…
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शंख भस्म के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

शंख भस्म (Shankh Bhasma) शंख (conch shell) से बनाई गयी एक आयुर्वेदिक औषधि है। आयुर्वेद में, शंख भस्म का उपयोग दस्त (पतले दस्त), मुहांसे, फुंसियां, यकृत वृद्धि, प्लीहा वृद्धि, पेट दर्द, अपच, भूख ना लगना, सीने में जलन, अम्ल प्रतिवाह, उदर विस्तार, शीघ्रकोपी आंत्र लक्षणों के उपचार में किया जाता है। इसके कई अन्य स्वास्थ्य लाभ और औषधीय उपयोग भी हैं।
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कासीस भस्म के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

कासीस भस्म (Kasis Bhasma) एक खनिज आधारित आयुर्वेदिक औषधि है, जिसमें फेरस सल्फेट (Ferrous Sulfate) मुख्य घटक है। इसमें उपस्थित लोहे के घटक के कारण, यह रक्ताल्पता और मासिक धर्म संबंधी विकारों के उपचार में सहायक है। कासीस भस्म भूख ना लगने, अपच, पेट में भारीपन, प्लीहावर्धन और बालों के समय पूर्व सफ़ेद होने जैसे रोगों के प्रबंधन में भी उपयोगी है।
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मण्डूर भस्म के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

मण्डूर भस्म एक आयुर्वेदिक निस्तापित लोह नियमन है। पुराने जंग लगे लोहे को मण्डूर भस्म के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है। रासायनिक रूप से, यह फेरिक ऑक्साइड (रेड आयरन ऑक्साइड) है। लौह-अल्पताजन्य रक्ताल्पता और रक्ताल्पता के कारण होने वाली दुर्बलता के लिए मण्डूर भस्म एक पसंदीदा औषधि है। आयुर्वेद में, इसका उपयोग रजोरोध (मासिक धर्म ना होना), कष्टार्तव,…
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स्फटिक भस्म (शुभ्रा भस्म) के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

स्फटिक भस्म (शुभ्रा भस्म) - Sphatika Bhasma (Shubhra Bhasma) का निर्माण फिटकिरी से किया जाता है। इसका उपयोग रक्तस्राव के विकारों, श्वसन रोगों, और त्वचा रोगों के उपचार के लिए किया जाता है। यह निमोनिया के कारण होने वाले सीने में दर्द, पुरानी खांसी, ब्रोंकाइटिस, तपेदिक में उल्टी, खून की उल्टी (उल्टी में रक्त), अत्यार्तव, रक्तप्रदर, भारी मासिक चक्र,…
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