आयुर्वेदिक प्रोप्राइटरी मेडिसिन

दिव्य अर्शकल्प वटी (Divya Arshkalp Vati)

दिव्य अर्शकल्प वटी (Divya Arshkalp Vati) बवासीर और भंगदर जैसी बिमारियों के निवारण के लिए के एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि हैं और इस औषधि का मुख्य रूप से प्रयोग इन्हीं बिमारियों के लिए किया जाता हैं। इस रोग में अक्सर आपरेशन की सलाह दी जाती हैं, ऐसे में यदि रोग की शुरुआत से ही इस औषधि का सेवन किये जाये तो यह औषधि आपरेशन के खतरे को दूर करती हैं और इसका पूरी तरह से उपचार करती हैं। इसके अलावा दिव्य अर्शकल्प वटी वबासीर और भंगदर जैसी बिमारियों में नसों में होने वाली सूजन की वजह से दर्द से भी छुटकारा देती हैं। इसका प्रयोग पुरानी कब्ज और पेट के दर्द में भी किया जाता है।

दिव्य अर्शकल्प वटी के घटक

दिव्य अर्शकल्प वटी निम्नलिखित घटको का मिश्रण हैं:

घटक द्रव्यमात्रा
शुद्ध रसौंत150 मिलीग्राम
हरीतकी (हरड़)100 मिलीग्राम
निम्ब (नीम) बीज100 मिलीग्राम
बकायन100 मिलीग्राम
काकमाची (मकोय)12.5 मिलीग्राम
घृतकुमारी12.5 मिलीग्राम
नाग दौना12.5 मिलीग्राम
रीठा5 मिलीग्राम
देसी कर्पूर5 मिलीग्राम
खून खराबा2.5 मिलीग्राम

औषधीय कर्म (Medicinal Actions)

  • अर्शोघ्न
  • वेदनास्थापक
  • शोथहर
  • कण्डूघ्न
  • पाचन – पाचन शक्ति बढाने वाली
  • अनुलोमन
  • दीपन
  • हल्का रेचक
  • रक्त स्तम्भन
  • रक्तप्रसधन
  • जीवाणु नाशक

चिकित्सकीय संकेत (Indications)

  • अर्श अर्थात बवासीर – खूनी व बादी बवासीर
  • भगन्दर की प्रारंभिक अवस्था
  • अग्निमांद्य और मंदाग्नि

अर्शकल्प वटी के लाभ एवं औषधीय प्रयोग

दिव्य अर्शकल्प वटी में मौजूद सभी घटकों का बवासीर के मस्सों पर प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक घटक के प्रभाव का प्रदर्शन करने के लिए यहाँ कुछ महत्वपूर्ण लाभ लिखे हैं।

खूनी व बादी बवासीर में उपयोगी

दिव्य अर्शकल्प वटी में मौजूद जड़ी-बूटियां पुरानी से पुरानी बवासीर के उपचार के लिए बहुत लाभदायक हैं। यह औषधि bleeding and non-bleeding दोनों तरह की वबासीर को दूर करती हैं इसके अलावा इनका कोई दुष्प्रभाव नही होता।

बवासीर में होने वाली परेशानियों के लिए

जैसा की बताया गया हैं की इस औषधि का निर्माण बवासीर के लिए ही किया गया हैं इसलिए यह इस रोग में होने वाली दर्द और रक्तस्राव को यह दूर करती हैं और होने वाली जलन के बहुत जल्दी राहत देती हैं।  

भगन्दर (Fistula-in-Ano) के उपचार के लिए

दिव्य अर्शकल्प वटी का प्रयोग भगन्दर की प्रारंभिक अवस्था में हितकारी है। हालांकि इस रोग में क्षार सूत्र या ऑपरेशन की जरूरत होती है। यदि क्षार सूत्र और त्रिफला गुगुल के साथ इस का प्रयोग किया जाये तो यह भगन्दर के उपचार में बहुत सहायक होता है।

पाचन क्रिया में लाभदायक

आयुर्वेद में मंदाग्नि अर्श का कारण माना जाता है। दिव्य अर्शकल्प वटी के घटक मंदाग्नि को दूर कर पाचन प्रक्रिया को भी सुचारू काम करने के लिए सहायता करता है जिससे खाना आसानी से पच जाता है। यह आम नहीं बनने देते और हानिकारक और विषैले पर्दार्थो को भी शरीर से बाहर निकालने में मदद करती है।

मात्रा एवं सेवन विधि (Dosage)

दिव्य अर्शकल्प वटी की सामान्य औषधीय मात्रा  व खुराक इस प्रकार है:

औषधीय मात्रा (Dosage)

बच्चे1 गोली
वयस्क2 गोली

सेवन विधि

दवा लेने का उचित समय (कब लें?)सुबह और रात्रि भोजन के एक घंटे बाद
दिन में कितनी बार लें?2 या 3 बार
अनुपान (किस के साथ लें?)गुनगुने पानी के साथ
उपचार की अवधि (कितने समय तक लें)4 से 12 सप्ताह

यदि आप को 12 हफ्तों में आराम न मिले तो आप चिकित्सक से परामर्श करें।

दुष्प्रभाव (Side Effects)

यदि दिव्य अर्शकल्प वटी का प्रयोग व सेवन निर्धारित मात्रा (खुराक) में चिकित्सा पर्यवेक्षक के अंतर्गत किया जाए तो अर्शकल्प वटी के कोई दुष्परिणाम नहीं मिलते। अधिक मात्रा में अर्शकल्प वटी के साइड इफेक्ट्स की जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है।

संदर्भ

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Dr. Jagdev Singh

डॉ जगदेव सिंह (B.A.M.S., M.Sc. Medicinal Plants) आयुर्वेदिक प्रैक्टिशनर है। वह आयुर्वेद क्लिनिक ने नाम से अपना आयुर्वेदिक चिकित्सालय चला रहे हैं।उन्होंने जड़ी बूटी, आयुर्वेदिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक आहार के साथ हजारों मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया है।आयुर टाइम्स उनकी एक पहल है जो भारतीय चिकित्सा पद्धति पर उच्चतम स्तर की और वैज्ञानिक आधार पर जानकारी प्रदान करने का प्रयास कर रही है।

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