कफ दोष के गुण, कर्म, मुख्य स्थान, प्रकार, असंतुलन, बढ़ने और कम होने के लक्षण

कफ एक ऐसी संरचनात्मक अभिव्यक्ति है जो द्रव्यमान को दर्शाता है यह हमारे शरीर के आकार और रूप के लिए भी ज़िम्मेदार है। जैविक रूप से, यह द्रव और पृथ्वी का संयोजन है। कफ के अणु शरीर के जटिल अणु होते हैं जो कोशिकाओं में उत्तकों, ऊतकों के अंगों और जो पूरे शरीर में अंगों की स्थिरता को बनाये रखते है। जैविक रूप से, सभी कोशिकाएं और उत्तक आदि कफ दोष से बने है,  हालांकि, इसकी संरचना में तरल और ठोस तत्वों के भिन्न अनुपात हो सकते हैं।

विषय-सूची

कफ की रचना

कफ की रचना जल (पानी / तरल पदार्थ) + पृथ्वी (पृथ्वी / ठोस)

हमारे शरीर में लगभग 50 से 70% पानी या तरल पदार्थ होते हैं। शरीर के पानी की  2/3 मात्रा कोशिकाओं के भीतर मौजूद इंट्रासेल्युलर तरल पदार्थ हैं। शरीर का एक तिहाई पानी कोशिकाओं के बाहर मौजूद कोशिकी द्रव है। यह द्रव शरीर और कफ में जल की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। शरीर के बड़े ढांचे जैसे हड्डियां, मांसपेशियां, अन्य अंगो के ठोस द्रव्य शरीर और कफ में पृथ्वी अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। कफ दोष के द्रव पित (Pitta Dosha) के लिए वाहन का काम करते है और वात (Vata Dosha) को नियंत्रण में रखते है।

कफ के कार्य

संक्षेप में, कफ दोष निम्नलिखित कार्य करता हैं:

  1. उपचय
  2. अवलंबन ​​और सामूहिकता
  3. स्नेहन – जोड़ों को स्नेहन जैसे
  4. गठन – शरीर के तरल पदार्थ और इंट्राव्हास्कुलर घटकों का निर्माण और रखरखाव
  5. शरीर के विकास और विकास
  6. शरीर की स्थिरता और दृढ़ता
  7. शक्ति
  8. रक्षा

कफ दोष एनोबोलिज़्म और जटिल अणुओं के गठन के लिए जिम्मेदार है, इसलिए यह पित के विपरीत काम करता है और इस के द्वारा पैदा की गयी अपचयता को जांचता है।

  • कफ शरीर का प्रमुख संघटन है। यह शरीर के मुख्य द्रव्यमान के लिए जिम्मेदार है।
  • सभी पोषक तत्व प्रमुखता से कफ दोष का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • शरीर में मौजूद तरल पदार्थ घर्षण प्रदान करते है और विभिन्न कोशिकाओं को पोषण प्रदान करता है
  • यह शरीर को ताकत देता है और शरीर में सभी मांसपेशियां कफ दोष का प्रतिनिधित्व करती हैं
  • यह प्रजनन क्षमता के लिए भी जिम्मेदार है

मुख्य कफ स्थान

कफ पूरे शरीर में मौजूद है और यह शरीर के पूरे द्रव्यमान के लिए ज़िम्मेदार है, लेकिन आयुर्वेद ने इसके कुछ प्रमुख स्थानों का वर्णन किया है जहां कफ दोष की मुख्य क्रियाएं देखी जा सकती हैं। कफ विकारों के इलाज के लिए आयुर्वेद में इस के कुछ चिकित्सीय महत्व हैं। दिल के ऊपर के सभी हिस्सों को कफ क्षेत्र माना जाता है।

  • सिर
  • गला
  • छाती
  • फेफड़े
  • संयोजी ऊतक
  • मोटे टिश्यू
  • स्नायुबंधन
  • लसीका
  • टेंडॉन्स

कफ के  उपप्रकार

कफ के पांच उपप्रकार हैं

  1. क्लेदक कफ
  2. अवलम्बक कफ
  3. बोधक कफ
  4. तर्पक कफ
  5. श्लेष्मक कफ

क्लेदक कफ

क्लेदक कफ पाचन नाली और उनमे होने वाला बलगम स्राव क्लेदक कफ दोष का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी प्रकृति चिपचिपी, मीठी, ठंडी और लसदार है।

स्थान

  • पेट
  • बृहदान्त्र से आंत

सामान्य कार्य

क्लेदक कफ  भोजन को गीला करता है और यह  खाने को छोटे कणों में  विभाजित करने में पाचक पित की मदद करता है। यह पाचन को सही रखता है और भोजन के मिलने में पित की सहायता करता है। यह पेट से पाचनांत्र तक भोजन को आगे करने में वात की सहायता करता है। उसके बाद भोजन को आंत और उसके बाद बृहदान्त्र तक पहुँचाने में भी यह मदद करता है। क्लेदक कफ दोष जठरांत्र प्रणाली को चिकनाई दे कर सहायता करता है।

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

क्लेदक कफ का बढ़ना पाचन समस्यायों को बढ़ा सकता हे जैसे कड़ी मल के साथ कब्ज का होना।

अवलम्बक कफ

अवलम्बक कफ छाती में मौजूद होता है और फेफड़ों और दिल को पोषण प्रदान करता है। यह हृदय की मांसपेशियों और फेफड़ों के ऊतकों के गठन में अहम भूमिका निभाता है। यह कफ दोष का प्रतिनिधित्व करता है, जो अंतरीय द्रव और बलगम स्राव का गठन करता है, जो वायुकोष्ठिका के बीच घर्षण को चिकना बनाता है और रोकता है।

स्थान

छाती हृदय, फेफड़े के साथ और छाती के आसपास की सीरस झिल्ली और उसके बीच के स्थान आदि।

सामान्य कार्य

  • दिल और फेफड़ों के प्रारंभिक द्रव्यमान का गठन
  • चिकनाई और घर्षण को रोकने के लिए
  • पौष्टिक मायोकार्डियम और एलिवोलि
  • परिसंचरणऔर श्वसन में सहायक

 इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • दिल और फेफड़ों के रोग
  • आलस्य

बोधक कफ

बोधक कफ मुँह के छेद और गले में रहते हैं। लार इसका अच्छा उदहारण है। यह भोजन को गीला करता है और भोजन के कणों को घोलता है। जब यह स्वाद कलिकाओं के सम्पर्क में आता है तो यह भोजन के स्वाद को महसूस करने में मदद करता है।

स्थान

मुँह की कैविटी और गला

सामान्य कार्य

  • खाने को गीला करना और भोजन के कणों को घोलना
  • खाने के स्वाद को पहचाने में मदद करना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • कब्ज़ की शिकायत
  • स्वाद परिवर्तन

तर्पक कफ

सिर तर्पक कफ का मुख्य स्थान है। दिमाग की प्राथमिक द्रव्यमान इसके कारण है। इसे आगे अंदर के द्रव और मस्तिष्कमेरु द्रव्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

स्थान

क्रेनियल गुहा तर्पक कफ का मुख्य स्थान है

सामान्य कार्य

  • कपाल गुहा और मस्तिष्क के मुख्य द्रव्यमान को बनाना
  • मस्तिष्क और अनुभव करने वाले अंगों को पोषण प्रदान करना
  • संवेदी और मोटर केंद्रों को उनका प्राकृतिक कार्यो की करने का समर्थन करना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • स्मरण शक्ति कम होना
  • इंद्रियों, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के प्राकृतिक कार्यों में खराबी या गड़बड़

श्लेष्मक कफ

श्लेष्मक कफ मुख्य रूप से स्नेहन के लिए जिम्मेदार है। यह जोड़ों में मौजूद होता है और यह कफ जोड़ों में श्लेष्म द्रव का यह अच्छा उदाहरण है।

स्थान

शरीर के जोड़ श्लेष्मक कफ का मुख्य स्थान है।

सामान्य कार्य

  • जोड़ों और इसके आसपास की संरचनाओं को पोषण प्रदान करना
  • जोड़ों को चिकनाई करके हिलने के दौरान घर्षण को रोकना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • अस्थिसंधिशोथ
  • जोड़ों का दर्द

कफ चक्र

भोजन के पाचन से संबंधित भोजन के पचने से पहले (खाना खाने के बाद जब आप पेट को भरा हुआ महसूस करें और पूर्ण संतुष्टि हो)*
भोजन खाने का संबंध खाना खाने के बाद*
आयु का संबंध बचपन
सुबह से  संबंध सुबह लगभग 6AM से 10 AM तक
रात्रि से संबंध लगभग 6 PM से 10 PM तक
* हालांकि, पित ने अपना काम शुरू कर दिया है, लेकिन अभी भी कफ प्रमुख है।

कफ चक्र के अनुसार दवाईआं लेना

इस सिद्धांत को तब लागू किया जाता है जब कफ विकारों को सामान्यीकृत किया जाता है और कफ दोष के लक्षण पूरे शरीर या पेट में दिखाई देते हैं।

  • स्वाभाविक रूप से, कफ ऊपर की अवधि में प्रभावशाली है, जैसा कि ऊपर दी तालिका में चर्चा की गई है।
  • कफ दोष को शांत करने वाली दवाईआं भोजन करने के बाद लेनी चाहिए। यह तब दी जाती है जब आप पेट के भारीपन जैसी समस्या से पीड़ित हों।
  • कफ दोष को शांत करने वाली दवाईआं सुबह 6 AM से 10 AM और रात को लगभग 6 PM से  10 PM तक लेनी चाहिए।यह कफ विकारों पर लागू होता है।

कफ और मौसम

कफ का संचय (कफ छाया) सर्दियों का अंत (शिशिर)
कफ का अधिक बिगड़ना (कफ प्रकोप) वसंत ऋतू (वसंत )
बढ़ी हुई कफ का शमन (कफ प्रश्म) गर्मी (ग्रीष्म)

सर्दी का अंत (शिशिरा)

प्रारंभिक सर्दियों (हेमंत) में, पाचन अग्नि और शरीर की ताकत सबसे अधिक स्तर पर होती है। इसलिए, भोजन की आदतें समान रहती हैं, लेकिन अग्नि (पाचन शक्ति) थोड़ा कम हो जाती है। पर्यावरण का तापमान भी इस दौरान ठंडा रहता है। शरीर में कफ दोष का संचय इन चीजों का परिणाम होता है। इसे कफ छाया कहा जाता है।

बसंत ऋतू  (वसंत)

इस में तापमान ठन्डे से हल्का गर्म या गर्मी को और परिवर्तित होता जाता है, जो जमा हुए कफ के द्रवीकरण का कारण है। यह कफ दोष के लक्षण भी पैदा कर सकता है। इसे कफ प्रकोप कहा जाता है।

गर्मी (ग्रीष्म)

गर्मियों में, खाद्य पदार्थ शुष्क  (रुक्ष)और हलके (लघु)होते हैं और इनकी शक्ति गर्म (उष्ण) होती है। ये गुण कफ के गुणों से विपरीत होते हैं।  यह गुण कफ दोष का शमन करते हैं। इसे कफ प्रशम कहा जाता है।

कफ का असंतुलन और इसके लक्षण

एक संतुलित चरण में कफ का होना अच्छी सेहत का प्रतीक है। कफ दोष का बढ़ना और कम होना रोगग्रस्त चरण जो दिखाता है। कफ के बढ़ने और कम होने को कफ दोष का असंतुलन कहा जाता है। दोनों में कफ असंतुलन के विभिन्न लक्षण हैं।

कफ के कम होने के लक्षण और स्वास्थ्य की स्थिति

निम्नलिखित लक्षण यह संकेत देते हैं की कफ कम है

  • त्वचा की शुष्कता बढ़ जाती है
  • मीठे स्वाद, तैलीय और भारी भोजन वाले पर्दार्थों को खाने की इच्छा
  • अधिक प्यास
  • पेरिस्टलसिस के हिलने में कमी और कब्ज का होना (वात उत्तेजना)
  • जोड़ों, मांसपेशियों और हड्डियों में कमजोरी महसूस करना
  • चक्कर
  • सामान्यकृत कमजोरी

बढे हुए कफ के लक्षण और स्वास्थ्य स्थितियां

निम्न लक्षणों में कफ दोष के बढ़ने का संकेत मिलता है

  • अत्यधित थूक के साथ खांसी
  • छाती में रक्त संचय
  • फेफड़ों में संचित श्लेष्म के कारण सांस न आना
  • पीली, ठंडी और चिपचिपी त्वचा
  • अत्यधिक लार
  • आलस्य
  • उनींदापन

बहुत अधिक बिगड़े हुए कफ के लक्षण

  • मुँह में मीठा या नमकीन स्वाद
  • भारीपन के साथ त्वचा का कसा हुआ होना
  • त्वचा के ऊपर मोटे और गहरे पेस्ट के लगे होने का अनुभव होना
  • सूजन
  • सफेद रंग का मलिनकिरण
  • खारिश (खाज )
  • अधिक नींद
  • सुन्न होना और अकड़ना

संदर्भ

  1. Kapha Dosha – AYURTIMES.COM
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