क्या तुलसी में सचमुच में पारा या mercury होता है? और क्या यह इतनी मात्रा में होता है कि यह आप के दांतों या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बन सकता है?

सबसे पहले हम जान लेते है कि कितनी मात्रा में पारा किसी भोजन पदार्थ में सामान्य (normal) माना जाता है।

WHO द्वारा दी गई गाइड लाइन्स के अनुसार प्रति दिन १ किलोग्राम शरीर के वजन के हिसाब से पारे की 2 µg की मात्रा सहनशील मानी जाती है।

इसका अर्थ है कि यही किसी व्यक्ति का वजन 60 किलोग्राम है तो उसके लिए 120 µg (0.12 mg) पारा की मात्रा सहनशील मानी जाए गी।

एक दिन में यदि 60 किलोग्राम वजन वाले व्यक्ति के द्वारा 0.12 mg या इसके कम मात्रा में पारे का सेवन किसी रूप में कर लिया जाए, तो वह स्वस्थ्य के लिए हानिकारक नहीं माना जाता। इतनी मात्रा में मरकरी का सेवन सुरक्षित माना जाता है।

तुलसी के पत्तों में पारा कितना होता है?

एक scientific study में तुलसी के १ किलो पत्तों में लगभग २ मिलीग्राम (2000 µg) के करीब पारे में मात्रा पाई गई।

यह मात्रा अधिकतम स्वीकार्य स्तर से अधिक पाई गई। यह स्टडी Journal of Environmental & Analytical Toxicology में प्रकाषित हुई है।

इस स्टडी में पारे का अधिकतम स्वीकार्य स्तर (maximum allowable levels) किसी भी खाद्य पदार्थ में 0.05 मिलीग्राम प्रति किलो माना गया है। वह भोजन आप के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित माना जाता है जिसमे पारे की मात्रा इसके बराबर या इससे कम होती है।

इस स्टडी में तुलसी के पत्तों में पारे की मात्रा अधिक पाई गई है। यह मात्रा अधिकतम स्वीकार्य स्तर से अधिक है।

परंतु तुलसी का सेवन 1 किलोग्राम की मात्रा में नहीं किया जाता।

आयुर्वेदिक ग्रंथो में तुलसी चूर्ण की अधिकतम मात्रा 3 ग्राम लिखी गई है। यही तुलसी चूर्ण को 2 बार लिया जाए तो कुल 6 ग्राम की मात्रा में कोई व्यक्ति इसका सेवन कर सकता है। यह मात्रा 60 किलोग्राम वजन वाले व्यक्ति के लिए पर्याप्त मानी जाती है।

यही 60 किलोग्राम वजन वाला व्यक्ति 6 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन तुलसी का सेवन करता है तो वह तुलसी से प्रतिदिन 0.012 mg या 12 µg पारे के मात्रा लेता है।

जैसे के हम ने पहले चर्चा की है कि 60 किलोग्राम वजन वाले व्यक्ति के लिए 0.12 mg या 120 µg की मात्रा तक पारा सुरक्षित माना जाता है। 6 ग्राम तुलसी से प्राप्त मात्रा इसके 10 गुना कम है।

यह एक घातक मात्रा नहीं है जो आप के दांतो जा अन्य अंगो को कोई नुक्सान पहुंचा सके।

इसके इलाबा Heavy metals की मात्रा जिस मिटटी में कोई पौदा लगया जाता है या पैदा होता है उस पर भी बहुत निर्धारित करती है। तुलसी के साथ भी कुछ ऐसा ही है।

अलग अलग स्थानों में पैदा हुई तुलसी में अलग अलग पारे की मात्रा देखने में मिली है। जो कि वहाँ की मिटटी में पारे की मात्रा कितनी है उस पर निर्भर करती है। ऐसा ही अन्य औषदीय पौदो के विषय में भी होता है।

भारत में बहुत सी सब्जियों और फलों में भी पारे की मात्रा ज्यादा पाई गई है। जिन को तुसली से अधिक मात्रा में खाया जाता है।

प्रदूषण वाले स्थानों में मरकरी (पारा) से साथ साथ लैड आदि अन्य हैवी मेटल्स भी अधिक पाए जाते है।

यदि तुलसी ऐसे स्थानों में उगाई जाती है तो उस में भी इन हैवी मेटल्स की मात्रा ज्यादा पाई जाएगी।

तो सच क्या है?

यह ठीक पाया गया है कि तुलसी के १ किलो पत्तों में पारे की मात्रा अधिकतम स्वीकार्य स्तर से कुछ ज्यादा है। परंतु तुलसी का सेवन बहुत ही कम मात्रा में होता है। जिसके कारण तुलसी से पारा का सेवन महत्त्वहीन या नामात्र होता है। सब्जियों और फलों का सेवन अधिक मात्रा में होता है और उनसे पारे का सेवन भी अधिक मात्रा में होता है।

यह धारणा भी उचित प्रतीत नहीं होती कि तुलसी को दांतो से चबा कर नहीं खाना चाहिए क्यों कि इसमें पारा होता है।

हालांकि आयुर्वेद में तुलसी को दांतो से चबाकर खाने के लिए या चबाकर न खाने के लिए कही कोई सिफारिश नहीं की गई। ऐसा ही बहुत सी अन्य औषधियों के विषय में भी है।

आयुर्वेद में तुलसी का प्रयोग स्वरस (juice), चूर्ण, क्वाथ के रूप में किया जाता है। चूर्ण के रूप में प्रयोग करने पर इसको मुख में थोरी देर के लिए रखा ही जाता है और पानी के साथ अन्दर निगला जाता है। बहुत से लोग तुलसी के पत्तों को चूसकर खाते है।

आयुर्वेद में तुलसी का प्रयोग पारद विष के उपचार के लिए भी किया जाता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ जैसे की रस तरंगिणी में अशुद्ध पारा के सेवन से होने वाले दुष्प्रभावो के उपचार के लिए तुलसी का प्रयोग लाभदायक माना है।

रस तरंगिणी ग्रन्थ में कुष्मांडादि गन का उल्लेख है जिसमे तुलसी एक मुख्य घटक है। कुष्मांडादि गन का प्रयोग मुख्य रूप से पारद विष के उपचार के लिए किया जाता है।

इसके इलाबा यह आधुनिक खोजों से भी प्रमाणित हो चूका है कि तुसली पारद विष (mercury poisoning) की एक उत्तम औषधि है। एक स्विस अल्बिनो चूहों पर हुई एक स्टडी में तुलसी को Mercury chloride से प्रेरित विषाक्तता के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता पाया गया है।

यदि मुख से दुर्गन्ध आती हो, तो यूनानी चिकित्सा प्रणाली में तुलसी के पत्तों को चबाकर खाने की सिफारिश की जाती है।

इन सभी तथ्यों के बाद हमें यह उचित प्रतीत नहीं होता कि तुलसी के पत्तों को चबाकर नहीं खाना चाहिए क्यों कि इसमें पारा होता है।  पारा इसमें जरूर होता है पर इतना नहीं होता कि यह आप में दांतो को या हेल्थ को कोई नुक्सान पहुंचा सके।

यह आप पर निर्भर करता है आप किस को सही मानते है। आप इस पर अपने विचार कमेंट में जरूर लिखें।

संदर्भ

  1. रस तरंगिणी, अध्याय 7, कुष्मांडादि गन
  2. Jena V, Gupta S (2012) Study of Heavy Metal Distribution in MedicinalPlant Basil. J Environ Anal Toxicol 2:161 https://www.omicsonline.org/study-of-heavy-metal-distribution-in-medicinal-plant-basil-2161-0525.1000161.php?aid=10555
  3. Sharma MK, Kumar M, Kumar A. Ocimum sanctum aqueous leaf extract provides protection against mercury induced toxicity in Swiss albino mice. Indian J Exp Biol. 2002 Sep;40(9):1079-82. PubMed PMID: 12587743. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/12587743
  4. http://www.who.int/phe/news/Mercury-flyer.pdf
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