भस्म एवं पिष्टी

पिष्टी परिभाषा, अवधारणा, बनाने की विधि, भावना द्रव्य, पिष्टी के लक्षण, विशेषता और संरक्षण

पिष्टी परिभाषा

औषधि योग्य शुद्ध पदार्थ का महीन चूर्ण कर गुलाब जल आदि तरल पदार्थ में नम करके खरल कर बनाई गई औषधियों को पिष्टी कहा जाता है।

पिष्टी को औषधि योग्य शुद्ध पदार्थ का महीन चूर्ण बनाकर तरल पदार्थ के साथ सूर्य या चन्द्रमा की रोशनी में बनाया जाता है। इन्हें अनग्निपुटा भस्म भी कहा जाता है क्योंकि यह बिना अग्नि के प्रयोग से बनायी जाती है।

पिष्टी का शाब्दिक अर्थ है पीसकर बनाया गया चूर्ण। सबसे पहले उस पदार्थ को शुद्ध किया जाता है जिसकी पिष्टी बनानी होती है। फिर उसे गुलाबजल में नम करके आवश्यकतानुसार सुखाया जाता है। अलग अलग प्रकार की पिष्टी के लिए इसे सूर्य या चंद्र की रोशिनी में सुखाया जाता है। यह प्रक्रिया कम से कम सात दिन या आवश्यकतानुसार उससे अधिक भी की जाती है। ऐसा तब तक किया जाता है जब तक पदार्थ इस स्थिति में ना आ जाये कि उसको पीसने से बारीक महीन चूर्ण ना बन जाये। पिष्टी के निर्माण में अग्नि का प्रयोग नहीं किया जाता है।

पिष्टी की अवधारणा

सभी रसद्रव्य इस रूप में दिए जाते हैं कि वे त्वरित अवशोषण और आत्मसात के लिए उपयुक्त हों। पिष्टी भी एक ऐसे ही रूप में होती है जिसके छोटे कण होते हैं और भस्म के सामान ही उत्कृष्ट होती है। पिष्टी भस्म की तुलना में अधिक सौम्य और शीतल होती है। रत्न का भस्म में रूपांतरण वर्ज्य है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इससे मानसिक शांति और धन की हानि होती है।

पिष्टी बनाने की विधि

औषधि के शुद्धिकरण के बाद उसे खल्व यन्त्र (खरल या ओखली और मूसल) में रखा जाता है और सामान्यतः गुलाब जल के साथ पीसा जाता है (खरल किया जाता है )। उसे पूरे दिन पीसने के बाद धूप सुखाया जाता है या रात्रि में चन्द्रमा की रोशनी रखा जाता है। इस प्रक्रिया को लगातार कम से कम  सात दिन तक किया जाता है या जबतक पिष्टी महीन चूर्ण के रूप में ना आ जाये।

भावना द्रव्य

गुलाब जल, केवड़ा अर्क, कदली रस, चंदनादि अर्क आदि इसके प्रमुख भावना द्रव्य हैं।

पिष्टी के लक्षण

जब तक औषधि महीन चूर्ण के रूप में ना आ जाए, तब तक पिष्टी तैयार नहीं होती है। इसे जांचने के लिए चूर्ण को अपनी तर्जनी और अंगुष्ठ के बीच में ले कर मसलें, आपको उसके महीन होने का अनुभव होना चाहिए। आपकी उँगलियों की रेखाओं में यदि वो घुस जाए, तभी उसकी उत्कृष्टता मानी जायेगी।

विशेषता और संरक्षण

पदार्थ के रंग के अनुसार पिष्टी भी अलग अलग रंगों की होती है। यह भस्म की तरह ही उत्तम और गुण वाली होती है। यह अनिश्चितकाल तक अपनी शक्ति बनाये रखती है। इन्हें कांच के डाट वाली बोतलों में ही रखना चाहिए।

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Dr. Jagdev Singh

डॉ जगदेव सिंह (B.A.M.S., M.Sc. Medicinal Plants) आयुर्वेदिक प्रैक्टिशनर है। वह आयुर्वेद क्लिनिक ने नाम से अपना आयुर्वेदिक चिकित्सालय चला रहे हैं।उन्होंने जड़ी बूटी, आयुर्वेदिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक आहार के साथ हजारों मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया है।आयुर टाइम्स उनकी एक पहल है जो भारतीय चिकित्सा पद्धति पर उच्चतम स्तर की और वैज्ञानिक आधार पर जानकारी प्रदान करने का प्रयास कर रही है।

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