स्फटिक भस्म (शुभ्रा भस्म) के लाभ, औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं दुष्प्रभाव

Sphatika Bhasma (Shubhra Bhasma) in Hindi

स्फटिक भस्म (शुभ्रा भस्म) – Sphatika Bhasma (Shubhra Bhasma) का निर्माण फिटकिरी से किया जाता है। इसका उपयोग रक्तस्राव के विकारों, श्वसन रोगों, और त्वचा रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।

यह निमोनिया के कारण होने वाले सीने में दर्द, पुरानी खांसी, ब्रोंकाइटिस, तपेदिक में उल्टी, खून की उल्टी (उल्टी में रक्त), अत्यार्तव, रक्तप्रदर, भारी मासिक चक्र, जीर्ण अतिसार और विषाक्तता के कारण पेट दर्द में लाभप्रद है। इसके बाहरी अनुप्रयोग भी त्वचा की समस्याओं जैसे दाद, श्वित्र (ल्यूकोडरमा) और विटिलिगो (प्राथमिक श्वित्र) के लिए लाभदायक है।

घटक द्रव्य (संरचना)

स्फटिक भस्म (शुभ्र भस्म) में फिटकरी का निस्तापित रूप होता है।

रासायनिक संरचना

स्फटिक भस्म में शामिल है:

  1. एल्यूमिनियम सल्फेट
  2. पोटेशियम सल्फेट

इसे पोटाश फिटकरी भी कहा जाता है, जो रंगहीन और जल में घुलनशील यौगिक है। आमतौर पर औषधियों में इसका प्रयोग इसके स्तम्मक और बहते खून को रोकने वाले गुणों के कारण किया जाता है। इसका रासायनिक सूत्र है:

K2SO4.Al2(SO4)3.24H2O

औषधीय कर्म (Medicinal Actions)

स्फटिक भस्म (शुभ्र भस्म) में स्तम्मक और बहते खून को रोकने वाले गुण होते हैं, जिसके लिए आमतौर पर इसका उपयोग किया जाता है।

आयुर्वेदिक गुण

इसमें कषाय, मधुर और अमल स्वाद होता है।

औषधीय गुण

  1. स्तम्मक
  2. कसैला – रक्तस्राव रोकता है
  3. कृमिनाशक
  4. सौम्य ज्वरनाशक
  5. दस्त रोकने वाला
  6. खाजनाशक (बाहरी अनुप्रयोग के रूप में)
  7. कफ-निस्सारक
  8. जीवाणुरोधी

चिकित्सीय संकेत

स्फटिक भस्म (शुभ्र भस्म) स्वास्थ्य की निम्नलिखित स्थितियों में सहायक है।

आंतरिक (मौखिक) उपयोग

  • काली खांसी
  • निमोनिया के कारण छाती में दर्द
  • ब्रोंकाइटिस (श्वसनीशोध)
  • तपेदिक में उल्टी करना
  • विषाक्तता के कारण पेट में दर्द
  • दस्त
  • गुदा रक्तस्राव
  • रक्त स्राव वाला बवासीर
  • उल्टी में रक्त
  • अत्यार्तव
  • रक्तप्रदर
  • भारी मासिक चक्र
  • आंत्र परजीवी संक्रमण
  • मलेरिया

बाहरी उपयोग

  1. रक्त स्राव
  2. घाव
  3. खुजली
  4. खाज
  5. श्वेत प्रदर
  6. कान का निर्वहन

स्फटिक भस्म लाभ और औषधीय उपयोग

स्फटिक भस्म (शुभ्र भस्म) में निम्नलिखित स्वास्थ्य लाभ और औषधीय उपयोग हैं:

काली खांसी        

स्फटिक भस्म का आतंरिक प्रयोग काली खांसी में बार बार आने वाले खांसी के दौरों को शांत करता है। इसमें जीवाणुरोधी गतिविधियां होती हैं, जो बोर्डेटेला पर्टुसिस के खिलाफ भी दिखाई देती हैं। कुछ रोगियों में, उल्टी भी हो सकती है। यह उल्टी को रोकने में भी मदद करता है। इस औषधि का कुछ दिनों का उपचार काली खांसी से छुटकारा पाने में मदद करता है।

निमोनिया

निमोनिया के चार चरण होते हैं।

  1. समेकन
  2. लाल यकृत के तत्वों में परिवर्तन
  3. भूरे यकृत के तत्वों में परिवर्तन
  4. समाधान

स्फटिक भस्म पहले दो चरणों में सहायक होती है: समेकन और लाल यकृत के तत्वों में परिवर्तन। पहले चरण में, फुफ्फुसावरणशोथ होता है और कोष्ठिका वायु को कोशिका रिसाव द्वारा बदल दिया जाता है। दूसरे चरण में, वायुकोष्ठिका तंतुमय रिसाव से भर जाती है और फेफड़े यकृत की तरह कड़े हो जाते हैं। इन दोनों चरणों में, स्फटिक भस्म बलगम को सोखने में मदद करता है और रोग को शांत करता है।

लेड विषाक्तता के कारण पेट दर्द

लेड विषाक्तता के कारण पेट दर्द और ऐंठन होती है। आयुर्वेद में, स्फटिक भस्म लेड विषाक्तता के कारण होने वाले पेट दर्द के लिए एक पसंदीदा औषधि है। आम तौर पर, इसका उपयोग कर्पूर और अफीम के साथ किया जाता है। आयुर्वेदिक शुद्धिकारक औषध भी शौच के माध्यम से लेड के उन्मूलन को प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाता है। इस प्रयोजन के लिए स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण (Swadishta Virechan Churna) और पंचसकार चूर्ण आदि का उपयोग किया जाता है।

अत्यार्तव, रक्तप्रदर और भारी मासिक चक्र

अत्यार्तव, रक्तप्रदर और भारी मासिक चक्र में होने वाले रक्तस्राव को रोकने के लिए इसकी  स्तम्मक और बहते रक्त को रोकने वाले गुण मदद करते हैं। आमतौर पर इसका उपयोग बोलबद्ध रस के साथ किया जाता है। हालांकि, इस प्रकार का उपचार एक आदर्श उपचार नहीं है और यह केवल अस्थायी राहत प्रदान करता है। एक आदर्श उपचार के अशोकारिष्ट (Ashokarishta), प्रवाल पिष्टी (Praval Pishti), कामदुधा रस (Kamdudha Ras), यष्टिमधु (Yashtimadhu), आमला (Amla) आदि सहित अन्य औषधियों का भी उपयोग किया जाना चाहिए।

मात्रा और सेवन विधि

बच्चे 65 से 250 मिलीग्राम
वयस्क 125 से 500 मिलीग्राम
अधिकतम संभावित खुराक प्रति दिन 1500 मिलीग्राम (विभाजित मात्रा में)

स्फटिक भस्म कैसे लें

खुराक (मुझे कितनी बार लेना चाहिए?) 2 से 3 बार
सही समय (मुझे कब लेना चाहिए?) भोजन के बाद
सहायक शर्करा, शहद या शर्बत बनफ्शा

सुरक्षा प्रोफाइल

स्फटिक भस्म (शुभ्र भस्म) का उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में करना चाहिए। बिना देखरेख के इसका उपयोग असुरक्षित हो सकता है। यह केवल एक अल्पकालिक उपयोग के लिए उपयुक्त है। दीर्घकालिक उपयोग के कई दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

स्फटिक भस्म के दुष्प्रभाव (Sphatika Bhasma Side Effects)

स्फटिक भस्म का दीर्घकालिक उपयोग या अधिक खुराक निम्न दुष्प्रभावों का कारण बन सकता है:

  1. मुँह का सूखापन
  2. जठरशोथ – जठरीय श्लेष्म की सूजन
  3. आंत्र सूजन
  4. व्रण (यह अधिक खुराक के साथ हो सकता है)
  5. मतली और उल्टी (यह अधिक खुराक के साथ हो सकता है और यदि भस्म कच्ची और अच्छी तरह से संसाधित ना हो)

गर्भावस्था और स्तनपान

गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए स्फटिक भस्म की सुरक्षा प्रोफाइल अच्छी तरह से स्थापित नहीं है। गर्भावस्था के दौरान इसका उपयोग ना करना अच्छा है। स्तनपान कराने के दौरान स्फटिक भस्म का उपयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करें।

सूचना स्रोत (Original Article)


संबंधित पोस्ट

Comments are closed.