आयुर्वेद

आयुर्वेद के त्रिसूत्र

हेतुलिँगौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्।

त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः।।

आयुर्वेद में चिकित्सा के तीन अंग – हेतु, लिंग, और औषध माने जाते है। इन तीनो को त्रिसूत्र कहा जाता है। आयुर्वेद अनुसार चिकित्सक को इन तीनों अंगों का ज्ञान होने चाहिए।

व्याख्या: कभी कभी, भारतीय आयुर्वेदिक विद्वान आयुर्वेद को त्रिसूत्र आयुर्वेद भी कहते हैं क्योंकि आयुर्वेद रोगों के उपचार के दौरान तीन बातों पर मुख्य रूप से बल देता है। मोटे तौर पर, चिकित्सा की सभी प्रणालियों में तीन बातें होती हैं विभिन्न रोगों के कारण का पता लगाना, निदान करना और उपचार करना। इन तीन चीजों को त्रिसूत्र कहा जाता है।

आयुर्वेद के तीन मुख्य अंग

आयुर्वेद में उपचार के तीन मुख्य अंग  हैं या आयुर्वेद विभिन्न रोगियों या रोगों का इलाज करने के लिए इसको तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित करता है। आयुर्वेद के इन तीन भागों को सामूहिक रूप से त्रिसूत्र के रूप में जाना जाता है।

हेतुरोगों के कारण – हेतुविज्ञान
लिंगरोगों के लक्षण – संकेत और लक्षण का ज्ञान
औषधदवाएँ व चिकित्सा – औषधि और उपचार का ज्ञान

पर्याय

त्रिसूत्र को इस रूप में भी कहा जाता है:

  1. त्रि स्कंध – हेतु, लिंग, औषध – त्रिसूत्र के विवरण के अनुसार ही इसका विवरण है।
  2. स्कंध त्रय – हेतु, दोष, द्रव्य – इसका कुछ अलग अर्थ है – अधिक पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

हेतु – रोगों के कारण

रोगों के पीछे के कारणों को हेतु कहा जाता है। यह कारक बीमारियां होने के लिए जिम्मेदार होते हैं। सामान्य कारक जो रोगों के उत्पन्न में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं नीचे दिए गए हैं:

  1. अनुचित आहार का सेवन
  2. आहार की बुरी आदतें
  3. खाद्य पदार्थ का अत्यधिक सेवन
  4. एक ही प्रकार के भोजन का अत्यधिक सेवन जैसे केवल मिठाइयों को अधिक खाना
  5. नींद की कमी
  6. अपनी क्षमता से अधिक काम करना
  7. उचित विश्राम का अभाव
  8. बाहरी कारक जैसे धूल, बैक्टीरिया या वायरस आदि
  9. दुर्घटनाओं से चोट लगना
  10. कुछ विषाक्त पदार्थों का सेवन और उनके द्वारा उत्पन्न अपच

लिंग – संकेत और लक्षण

रोगों के कारण शारीरिक या मानसिक कार्यों में कुछ बदलाव आ जाते हैं। मरीज को अपने शरीर में कुछ परेशानी का अनुभव होता है और मन चिड़चिड़ा या परेशान हो जाता है। ये शरीर में लक्षण या लिंग का प्रतिनिधित्व करते हैं। चिकित्सक द्वारा कुछ सुराग देखे जाते हैं और इन्हें संकेत कहा जाता है। आयुर्वेद में लिंग लक्षण और संकेत का सामूहिक प्रतिनिधित्व करता है। आयुर्वेद में, विशिष्ट दोष के प्रभुत्व के अनुसार लक्षण और संकेत का निदान किया जाता है। दोष के प्रभुत्व के अनुसार, तीन दोषों को संयुलित रखने के लिए उपचार और आहार निर्धारित किया जाता है।

औषध – चिकित्सा या उपचार

औषध आयुर्वेदिक चिकित्सा या त्रिसूत्र का तीसरा हिस्सा है। इसमें शामिल हैं आहार में परिवर्तन, उपवास, जड़ी बूटी, आयुर्वेदिक निर्माण जैसे काढ़े, चूर्ण, गोलियां, आसव, अर्क, पाक आदि। आयुर्वेदिक उपचार का मुख्य सिद्धांत तीन शरीर के दोषों को संतुलित और दो मन के दोषों को नियंत्रित करना है।

सूचना का स्रोत

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Dr. Jagdev Singh

डॉ जगदेव सिंह (B.A.M.S., M.Sc. Medicinal Plants) आयुर्वेदिक प्रैक्टिशनर है। वह आयुर्वेद क्लिनिक ने नाम से अपना आयुर्वेदिक चिकित्सालय चला रहे हैं।उन्होंने जड़ी बूटी, आयुर्वेदिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक आहार के साथ हजारों मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया है।आयुर टाइम्स उनकी एक पहल है जो भारतीय चिकित्सा पद्धति पर उच्चतम स्तर की और वैज्ञानिक आधार पर जानकारी प्रदान करने का प्रयास कर रही है।

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